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हे द्वारा चारा संरक्षण (Use of green fodder for hay making)

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साल के कुछ ही माहों में पशुओं के लिए हरा चारा आवश्यकता से अधिक उपलब्ध रहता है, जबकि अधिकतर माहों में इसका बिल्कुल अभाव रहता है। अधिक पैदावार के समय चारे की अतिरिक्त मात्रा को संरक्षित करें, ताकि अभाव के समय इसे खिलाकर पशुओं की शारीरिक वृद्धि एवं उत्पादन बरकरार रखा जा सके।

चारा सरक्षण की दो प्रचलित विधियों में से “हे” बनाना अधिक सरल एवं कम महनत वाला है। इसमे हरे चारे कि फसल को उपर्युक्त पौष्टिक अवस्था में काटकर उस समय तक सुखाया जाता है जब तक कि उसमें आद्रता 15%  या इससे कम न हो जाये। “हे” बनाते समय चारे का हरा रंग, पत्तियाँ एवं पोषक तत्व क्षीतग्रस्त न हों, इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।

“हे” की विशेषताएं एवं उस में निहित पोषक तत्वों की मात्रा निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है:-

1. फसल की अवस्था

“हे” बनाने के लिए फसल की कटाई उचित अवस्था पर करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। ऐसी फसल जो पकने कीHay making अवस्था में पहुंच रही हो, इस अवस्था में पौधे कड़े एवं शुष्क हो जातें हैं, उनमें रेशेदार तत्वों की मात्रा अधिक हो जाती है, पाचनशीलता घट जाती है एवं पोषक तत्वों का स्तर कम हो जाता है।

इसी प्रकार प्रारम्भिक अवस्था में काटी गयी नयी फसलें भी “हे” बनाने हेतु उपयुक्त नहीं होती, क्योंकि इस अवस्था में नमी अधिक होने के कारण सुखाना कठिन होता है। इस अवस्था में पौधों में निहित पोषक तत्वों की मात्रा एवं अनुपात भी अच्छा नहीं रहता।

मक्का, ज्वार आदि फसलों के तने ठोस एवं कठोर होते हैं, परन्तु पत्तियाँ चपटी एवं पतली होती हैं। इसे सुखाने पर तने देर से सूखतें हैं एवं पत्तियाँ सुखकर झड़ने लगती हैं। ऐसी फसलों में तनों को लकड़ी के रोलर अथवा हथौड़ी की सहायता से दबाकर तोड़ना अच्छा रहता है। ऐसा करने से तनों में दरारें पड़ जाती हैं व सूखने की प्रक्रिया में तेज़ी आ जाती है। इस प्रक्रिया में पत्तियों को अधिक नुकसान नहीं पहुँचना चाहिए, क्योंकि सूखने पर ऐसी पत्तियाँ झड़ जाती हैं। चारे की समस्त फसलों में अन्य भागों की अपेक्षा पत्तियों में प्रोटीन की  मात्रा अधिक रहती है, अतः “हे” बनाने में पत्तियों को कम से कम क्षति पहुँचानी चाहिए।

 

2. फसल की किस्म

चारे की वह समस्त फसलें जिन्हें हरी अवस्था में पशुओं को खिलाया जा सकता है, “हे” बनाने के लिए उपयुक्त हैं। इनमें से कुछ सर्वाधिक उपयुक्त आसानी से “हे” बनाने वाली किस्में निम्मानुसार हैं:-

  • फलीदार फसलें:- रिजका, बरसीम, लोभिया, सेम।
  • दाने वाली फसलें:- जई, बाजरा, ज्वार।
  • चारा फसलें:- अंजन, नेपियर, दीनानाथ आदि।

 

3. चारे की कटाई

“हे” बनाने के लिए उपरोक्तनुसार चारे की किस्मों को उचित अवस्था में काटना चाहिए। सामान्य रूप से फलीदार फसलों को पुष्प अवस्था के प्रारंभ से लेकर मध्य तक काटना चाहिए। बरसीम को पुष्प अवस्था के प्रारंभ में काटना चाहिए। रिजका को मध्य पुष्प अवस्था में काटा जाना चाहिए। दाने वाली फसलों को पुष्पावस्था के प्रारंभ में काटना चाहिए। चारे की घास किस्मों को पूर्ण पुष्पावस्था से पहले काटी जानी चाहिए। संकर नेपियर की कटाई उस समय करें, जब पौधे की ऊंचाई 1 मीटर हो जाये।

 

4. कटाई का समय

चारा फसल की कटाई उपरोक्तनुसार उचित अवस्था एवं किस्मों को ध्यान में रखते हुए तब करें जब उसे स्वाभाविक रूप से सिंचाई की आवश्यकता हो। इस समय पौधों में आर्द्रता कम होने के कारण इन्हें सुखाना कठिन नहीं होता है।

5. सुखाने की विधि

कटाई के बाद पौधों को चारा काटने की मशीन पर छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लेने से इन्हें सुखाना सरल हो जाता है। इस प्रकार काटे गये चारे को पतली परतों में छायादार स्थान में फैलाकर सुखाना चाहिए। सूर्य की सीधी किरणों में सुखाने से हरा रंग नष्ट हो जाता है एवं पौष्टिकता घट जाती है। दिन के समय इसे सुखाते हुए हर 4 घंटों में पलटना चाहिए, जिससे नीचे का गीला चारा ऊपर आकर सूख जाता है। रात्रि के समय चारे को समेट कर शंकुवाकार बना देने से बरसात होने पर भी भीगने से बच जाता है।

6. भण्डारण की विधियाँ

वायुमण्डल में निहित आर्द्रता एवं मौसम के अनुसार हरे चारे को सूखने में 2 – 4 दिन का समय लग जाता है। तत्पश्चात् इसे सावधानीपूर्वक उठाकर नमी-रहित स्थान में भण्डारण हेतु रखना चाहिए। जहां पर कुट्टी बनाना संभव न हो वहां समूचे पौधे को सुखाकर भण्डारण हेतु ढ़ेर के रूप में रखना चाहिए। नम स्थानों पर त्रुटिपूर्ण भण्डारण से “हे” में नमी का स्तर बढ़ जाता है। इस अवस्था में इसमें फफूंद एवं जीवाणुओं के हैनिकारक प्रभाव दिखाई देने लगते हैं। कभी-कभी भण्डारित “हे” में अधिक नमी हो जाने के कारण जीवाणुओं के खास क्रिया से अधिक गर्मी पैदा हो जाती है, जिससे सूखा चारा धुम्रयुक्त होकर काला पड़ जाता है।

7. भण्डारण हेतु उचित स्थान

Storing hay“हे” का भण्डारण ऐसे स्थान पर करें जहाँ दीमक एवं चूहों का प्रकोप न हो, साथ ही बरसात का पानी इकट्ठा न हो एवं इस प्रकार से कि बरसात होने पर “हे” अधिक मात्रा में खराब न हो। “हे” के भण्डारण के लिए नमीरहित स्थान का होना आवश्यक है। अधिक वर्षा वाले स्थानों पर चारे को सुखाना कठिन होता है, जिससे उचित प्रकार से संरक्षण नहीं हो पाता। ऐसी परिस्थितियों में हरे चारे को सुखाने में विशेष ध्यान रखना चाहिए।




“हे” बनाने की विधि

  1. “हे” बनाने के लिए उपयुक्त चारा फसलों को उचित अवस्था में कटाई करें। चारा फसल की कटाई जमीन की सतह से 6 इंच ऊपर से करें, ताकि इसे पुनः बढ़ने में आसानी हो। चारा फसल की कटाई सुबह के समय करें, ताकि इसे दिन के समय धूप में सूखने का समय मिल सके।
  2. काटी गई चारा फसल को 2 दिनों तक धूप में सुखायें। दिन के समय इसे 4 घंटे के अंतराल से पलटें, ताकि पूरी धास समान रूप से सूख सके।
  3. तत्पश्चात् इसे 2 दिनों तक छाया में सुखायें। इस समय नमी 15% के लगभग हो जाती है एवं हरापन बरकरार रहता है।
  4. अब इसे शंकुवाकार या खड़ी स्थिति में इकट्ठा कर के रखें।
  5. पशुओं को खिलाने से पहले इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर कुट्टी बना लें।
  6. इसे प्रतिदिन प्रति पशु 2-5 किग्रा. प्रति 100 किग्रा. भार की दर से खिलायें।


संकलनकर्ताः डॉ. पी. एस. देशमुख, चारा विशेषज्ञ. प्रशिक्षण इकाई
बस्तर एकीकृत पशुधन विकास परियोजना, जगदलपुर, (बस्तर) छत्तिसगढ़


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